: बहुत ही शुभ दिन माना जाता है फुलेरा दूज - स्वाती सिंह साहिबा
Thu, Mar 9, 2023
फागुन मास हिंदू कालंतर का 12वां महीना है, और इसी महीने की द्वितीया को मनाई जाती है, फुलेरा दूज । फुलेरा दुज एक बहुत ही शुभ दिन माना जाता है फुलेरा दूज से ही होली के त्यौहार का शुभारंभ होता है, भारत के कई प्रदेशों में इस दिन फूलों की रंगोली बनाई जाती है, और देखिए हमारे संस्कृति को कि इसी रंगोली के सूखे हुए फूलों से होली के मधुर और प्राकृतिक रंग बनाए जाते हैं। यह सनातन धर्म है यह हिंदू संस्कृति है, जिसका आरंभ भी प्रकृति को ऊर्जा देता है और जिसका अंत समस्त सृष्टि में रंग भरता है।
फुलेरा दूज पर उत्तर भारत की और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में गोबर के छोटे आकार के उपले बनाए जाते हैं जिन्हें अपने अपने क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है उत्तर भारत में इसे गुलरिया कहाँ जाता हैं और मध्य भारत के निमाड़ क्षेत्र में इसे निमाड़ी भाषा में वैडिये या बडकुल्ये के नाम से जाना जाता है ।निमाड़ क्षेत्र में गोबर कि कई आकृतियां बनाई जाती है जैसे पान नारियल गोरी इन सब आकृतियों के छोटे-छोटे रूप बनाकर उनके बीच में छिद्र कर उन्हें एक डोर में पिरोकर होलिका दहन के दिन होलिका को समर्पित किया जाता है। इन उपलों को बनाने की विधि भी बड़ी आकर्षित है गोल आकृति बनाने के लिए पुराने चुड़ों को कन्याए साल भर संभाल कर रखती है जिनके अंदर गोबर को भरा जाता है और बीच में एक लकड़ी से छिद्र कर उसे धूप में सुखाया जाता है गोबर का नारियल दो मिट्टी के दिपक को आपस में जोड़कर उसके अंदर कुछ पत्थरों के टुकड़े डालकर उसके ऊपर से गोबर की थाप देखकर बनाया जाता है। पान की आकृतियां अपने दोनों हाथों की उंगलियों को मिलाकर बनाई जाती है सभी सखी सहेलियां इससे बनाने में बड़ी मेहनत और लगन के साथ में धमाचौकड़ी के साथ एक दूसरे का साथ देकर बनाती है। और इसलिए होली का त्यौहार एकता का प्रतीक भी माना जाता है। नारी पक्ष इस कार्य को बहुत ही उत्साह और प्रसन्नता से करती हैं और मनाती हैं।
निमाड़ क्षेत्र के सतपुड़ा और विंध्यांचल पर्वत की क्षेत्रों में बसने वाली आदिवासी जन जीवन के लिए फागुन का त्यौहार नया उत्साह लेकर आता है। आधुनिकता के दौर में भी प्रकृति के रंग में रंगने का पाठ यहांँ से सिखाया जाता है, होली में खेले जाने वाले रंग टेसू के फूलों और बीया के फूलों को सूखाकर बनाया जाता है जिनकी अपनी प्राकृतिक महक से वातावरण को खुद ब खुद महक जाता है।निमाड़ क्षेत्र के खरगोन जिले और झाबुआ जिले में भगोरिया की पहचान अपने आप में अद्वितीय है फागुन मास में ही भगोरिया लगाया जाता है भगोरियों में आदिवासी जन जीवन कला आदिवासी संस्कृति देखने को मिलती है यहांँ आदिवासी कन्याएंँ अपना वर वधु अपना हमसफर चुनने के लिए स्वतंत्र रहते है उनका जीवन रंगीन हो,खुशनुमा हो ,हर रंग की तरह उनका जीवन सुखमय और जीवन के हर रंग से सदा भरा रहे, इसी सोच के साथ वर वधु एक दूसरें को होली का रंग लगा कर नए जीवन का आरंभ करते हैं फागुन मास की द्वितीय दूज इसलिए भी शुभ मानी जाती है। खेत खलियान में गेहूं की बाली फागुन मास में पक जाती है और गेहूंँ की कटाई की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। कई घरों में हरे चने की पूरणपोली बनाकर होलिका को प्रसाद के रूप में भोग लगाकर सबका मुंँह मीठा किया जाता हैं।फागुन मास कृष्ण और राधा की पवित्र प्रेम की कथाएंँ अपने साथ लिए हैं,प्रेम एक दूसरे में मिल जाने का प्रतीक हैं एक दूसरे में रंग जाने का प्रतीक है कृष्ण औंर राधा का प्रेम भी एक दूसरे को समर्पित करने का प्रतीक हैं, एक दूसरे के रंग में रंग जाना एक दूसरे का हो जाना प्रेम का सच्चा अर्थ तो यही है।
स्वाति सिंह साहिबा
संस्थापिका अनुरनन प्रतिध्वनि मंच
महेश्वर
: श्री खाटू श्याम दर्शन एवं फाग महोत्सव मनाने जाएगा 70 भक्तों का जत्था
Mon, Feb 27, 2023
इटारसी/नर्मदापुरम : धार्मिक आस्था के चलते प्रतिवर्ष अलग अलग स्थानो से बाबा खाटू श्याम के दर्शन करने के लिए हजारों धर्मप्रेमी जनता दर्शन के लिये आती है, इसी परंपरा को इटारसी एवं नर्मदापुरम के भक्त भी निर्वाह करते चले आ रहे है, दिनांक 1 मार्च को करीब 70 यात्रियों का जत्था रवाना होगा जो बाबा के दर्शन एवं फाग महोत्सव के लिये रवाना होगा।
"हारे के सहारे" श्री श्याम बाबा के दर्शन हेतु इटारसी से करीब 70 श्याम प्रेमियों का ग्रुप 1 मार्च को चेन्नई जयपुर एक्सप्रेस से जयपुर के लिए निकलेगा, 2 तारीख को प्रातः सभी जयपुर पहुंचेंगे वहां से प्रस्थान कर खाटू धाम पहुंचेंगे वहां से दर्शन करके 3 तारीख ग्यारस को 18 किलोमीटर की पैदल निशान यात्रा करके बाबा को निशान चढ़ाएंगे, 4 मार्च को बारस के दर्शन होंगे, इस तरह 5 मार्च की सुबह श्याम प्रेमियों का यह ग्रुप वापस इटारसी आएगा, उल्लेखनीय है कि श्री श्याम बाबा के लाखों भक्त इस फाग महोत्सव में शामिल होने प्रतिवर्ष खाटू धाम जाते हैं और बाबा का आशीर्वाद लेते हैं।
मनीष जायसवाल