: काश: मेरी भी एक बेटी होती - अनिता गौतम
Wed, May 3, 2023
हृदय की न जाने ये कैसी विडंबना है, प्रत्येक क्षण सत्य होते हुए भी न जाने लगता क्यों सपना है? फिर भी दिल के किसी कोने से यह आवाज है आती, कि काश:! मेरी भी एक बेटी होती, जिसमें में अपना बचपन स्मरण कर पाती जैसे मैं अपने माता-पिता की दुलारी हूं शायद वह भी मेरी प्यारी होती, परछाई में देखती अपनी छवि को सजाती और संवारती जैसे कि आसमान में नन्ही परी होती, यूँ तो दिल को समझाने को दुनिया की हर बेटी मेरी बेटी है पर सपने कहां अपने होते हैं आंख खुलते ही सामने से ओझल हो जाते हैं, जो सुख तो क्षण भर देते हैं पर दुख: असीमित दे जाते हैं, पर ना जाने क्यों समाज की यह असहनीय दुर्दशा देखकर शरीर मृत शिथल हो जाता है, जब आँखों के समक्ष एक बेटी का अस्तित्व ही माँ की कोख में मिटा दिया जाता है, तब सहसा हृदय में एक सवाल विचरण कर जाता है कि काश: तू अगर कहीं भगवान है तो क्यों तमाशबीन बने यह सब देखता है, क्यों नहीं तू अपनी इच्छाधारी शक्ति का परिचय देता, जिससे पनपते हैं असुर और देवता, क्यों कुछ हैवान इस धरा पर उपज जाते हैं जो एक ही क्षण में किसी के घर की लाज का अस्तित्व ही मिटा जाते हैं, चंद क्षणो की हवस मैं क्यों वह यह सब भूल जाते हैं, कि हमने जिस का हनन किया वह भी किसी की बहन और बेटी है, हम बात करते हैं वंश रुपी उस इमारत की जिसकी नीव में लगी वह पहली ईंट तो बेटी है, बेटी शब्द से क्यों आज ये समाज अनभिज्ञ व अनजान है, क्योंकि बेटी ने ही जन्मे ब्रह्मा, विष्णु, महेश और रुद्र जैसे भगवान है।
अंत में मैं यह सब अनदेखा कर देती हूँ कि काश: मेरी भी एक बेटी होती......
अनिता गौतम
आगरा, उत्तरप्रदेश
: मेरी एक नहीं दो सुपर मॉम - शिवांगी तिवारी
Wed, May 3, 2023
सबके जीवन में मां का महत्व ही अलग है और में बहुत खुशनसीब हूं की मेरे जीवन में एक नही दो मां है और दोनो ही मेरे लिए सुपर मॉम्स हैं, एक ने मुझे जन्म दिया पढ़ाया लिखाया आत्मनिर्भर बनाया, अपने अंदर के सारे गुण सिखाए, अध्यापिका और साहित्यिक कवियत्री होते हुए भी किस तरह से घर को संभाला और हमे भी ज्ञान का पाठ सिखाया की जीवन में किस तरह संतुलन बनाकर रखना है, कर्तव्य और कर्म की आवश्यकता है, जिंदगी में उसूलों का होना क्यों जरूरी है, में उनके द्वारा दिए गए संस्कारों का जितना आभार व्यक्त करू कम है, आज भी उनकी सलाह मेरे लिए बहुत फायदेमंद और महत्वपूर्ण होती हैं।
मेरी दूसरी मां जो मुझे मेरी शादी के बाद सास के रूप में मिली, दिनभर सबका ख्याल रखने वाली, कभी किसी का बुरा नही सोचने वाली, दया से भरपूर अन्नपूर्णा देवी जिनका होना हमारे घर की नींव है, वो घर की स्तंभ है, उन्होंने मुझे एक दुसरे का ख्याल रखना, दया करना और सबको माफ करना सिखाया है, भगवान सभी को ऐसी मां दे जिनसे जीवन पूर्ण लगता है, सुरक्षित होने का एहसास जीवन पर्यंत रहता हो।
शिवांगी तिवारी, Founder of Mysoulmantra - गुड़गांव
: बहुत ही शुभ दिन माना जाता है फुलेरा दूज - स्वाती सिंह साहिबा
Thu, Mar 9, 2023
फागुन मास हिंदू कालंतर का 12वां महीना है, और इसी महीने की द्वितीया को मनाई जाती है, फुलेरा दूज । फुलेरा दुज एक बहुत ही शुभ दिन माना जाता है फुलेरा दूज से ही होली के त्यौहार का शुभारंभ होता है, भारत के कई प्रदेशों में इस दिन फूलों की रंगोली बनाई जाती है, और देखिए हमारे संस्कृति को कि इसी रंगोली के सूखे हुए फूलों से होली के मधुर और प्राकृतिक रंग बनाए जाते हैं। यह सनातन धर्म है यह हिंदू संस्कृति है, जिसका आरंभ भी प्रकृति को ऊर्जा देता है और जिसका अंत समस्त सृष्टि में रंग भरता है।
फुलेरा दूज पर उत्तर भारत की और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में गोबर के छोटे आकार के उपले बनाए जाते हैं जिन्हें अपने अपने क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है उत्तर भारत में इसे गुलरिया कहाँ जाता हैं और मध्य भारत के निमाड़ क्षेत्र में इसे निमाड़ी भाषा में वैडिये या बडकुल्ये के नाम से जाना जाता है ।निमाड़ क्षेत्र में गोबर कि कई आकृतियां बनाई जाती है जैसे पान नारियल गोरी इन सब आकृतियों के छोटे-छोटे रूप बनाकर उनके बीच में छिद्र कर उन्हें एक डोर में पिरोकर होलिका दहन के दिन होलिका को समर्पित किया जाता है। इन उपलों को बनाने की विधि भी बड़ी आकर्षित है गोल आकृति बनाने के लिए पुराने चुड़ों को कन्याए साल भर संभाल कर रखती है जिनके अंदर गोबर को भरा जाता है और बीच में एक लकड़ी से छिद्र कर उसे धूप में सुखाया जाता है गोबर का नारियल दो मिट्टी के दिपक को आपस में जोड़कर उसके अंदर कुछ पत्थरों के टुकड़े डालकर उसके ऊपर से गोबर की थाप देखकर बनाया जाता है। पान की आकृतियां अपने दोनों हाथों की उंगलियों को मिलाकर बनाई जाती है सभी सखी सहेलियां इससे बनाने में बड़ी मेहनत और लगन के साथ में धमाचौकड़ी के साथ एक दूसरे का साथ देकर बनाती है। और इसलिए होली का त्यौहार एकता का प्रतीक भी माना जाता है। नारी पक्ष इस कार्य को बहुत ही उत्साह और प्रसन्नता से करती हैं और मनाती हैं।
निमाड़ क्षेत्र के सतपुड़ा और विंध्यांचल पर्वत की क्षेत्रों में बसने वाली आदिवासी जन जीवन के लिए फागुन का त्यौहार नया उत्साह लेकर आता है। आधुनिकता के दौर में भी प्रकृति के रंग में रंगने का पाठ यहांँ से सिखाया जाता है, होली में खेले जाने वाले रंग टेसू के फूलों और बीया के फूलों को सूखाकर बनाया जाता है जिनकी अपनी प्राकृतिक महक से वातावरण को खुद ब खुद महक जाता है।निमाड़ क्षेत्र के खरगोन जिले और झाबुआ जिले में भगोरिया की पहचान अपने आप में अद्वितीय है फागुन मास में ही भगोरिया लगाया जाता है भगोरियों में आदिवासी जन जीवन कला आदिवासी संस्कृति देखने को मिलती है यहांँ आदिवासी कन्याएंँ अपना वर वधु अपना हमसफर चुनने के लिए स्वतंत्र रहते है उनका जीवन रंगीन हो,खुशनुमा हो ,हर रंग की तरह उनका जीवन सुखमय और जीवन के हर रंग से सदा भरा रहे, इसी सोच के साथ वर वधु एक दूसरें को होली का रंग लगा कर नए जीवन का आरंभ करते हैं फागुन मास की द्वितीय दूज इसलिए भी शुभ मानी जाती है। खेत खलियान में गेहूं की बाली फागुन मास में पक जाती है और गेहूंँ की कटाई की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। कई घरों में हरे चने की पूरणपोली बनाकर होलिका को प्रसाद के रूप में भोग लगाकर सबका मुंँह मीठा किया जाता हैं।फागुन मास कृष्ण और राधा की पवित्र प्रेम की कथाएंँ अपने साथ लिए हैं,प्रेम एक दूसरे में मिल जाने का प्रतीक हैं एक दूसरे में रंग जाने का प्रतीक है कृष्ण औंर राधा का प्रेम भी एक दूसरे को समर्पित करने का प्रतीक हैं, एक दूसरे के रंग में रंग जाना एक दूसरे का हो जाना प्रेम का सच्चा अर्थ तो यही है।
स्वाति सिंह साहिबा
संस्थापिका अनुरनन प्रतिध्वनि मंच
महेश्वर