: माँ का कोई विकल्प नहीं - नगेंद्र बाला बारैठ
सभ्य समाज का एक मज़बूत स्तंभ स्त्री है ये मेरी व्यक्तिगत विचारधारा है। बहुमुखी प्रतिभा की धनी, सौम्यता व अनुपम सौंदर्य की प्रतिमा, सहनशीलता व मधुर स्वभाव युक्त एक नारी ही हो सकती है, यूं तो ईश्वर ने उसे अनेक रूप दिए है लेकिन जो उसका एक निर्मल सा रूप है वो है माँ का, कहने को तो एक छोटा सा शब्द होगा लेकिन इस शब्द में पूरा ब्रह्मांड समाया है। जब जब एक बालक माँ पुकारता है तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता चला जाता है, उसमें एक ऊर्जा का संचार होता है और एक मानसिक सुकून मिलता है। जब भी मन उदास होता है, कभी मन नहीं लगता, या फिर बीमार होते है तो ना किसी से बात करने का दिल करता है ना ही कुछ और काम करने का मन, ऐसे में हमारे सब परेशानियों का मरहम माँ ही होती है। उसमें वो ओरा होता है जो हमे आंतरिक उपद्रवों से लड़ने की ताकत देता है।
जब जब हार मानकर बैठ जाते है तो माँ ही होती है जो अपनी मीठी वाणी से हम में वो कठिन से कठिन काम करने का ज़ज्बा देती है। इसे ईश्वरीय चमत्कार कहें या कोई वैज्ञानिक कारण लेकिन इस बात का इतिहास भी गवाह है कि माँ की आवाज़ मात्र से गहरी नींद में सोया बालक भी एक बार उठ कर हाँ बोल देता है, दुर्गासप्तशती में लिखा है कि जो अनेक बार पाप कर चुके है, जो रक्षसी स्वभाव युक्त है वो मेरी शरण में आ एक बार "माँ" पुकारते है, मैं उनके सहस्त्र पाप क्षमा कर देती हूं और उनको वो गति प्राप्त होती है जो देवता आदि के लिए है। जब इतने बड़े ग्रंथ में माँ को ये स्थान दिया गया है तो हम मानव क्यों नहीं ये बात समझ पाते है, ना जाने कितनी बार हम उसका दिल दुखाते है, कितनी ग़लतियाँ करते है, उसे छोड़कर अपना एक अलग संसार बसा लेते है, कितनी ही नादानीया कर देते है मगर वो हमे सहज ही माफ़ कर देती है और गले से लगाये रखती है। आज हमारा भी यही कर्तव्य बनता है कि हम भी उसकी मुस्कराहट को सबसे पहले रखे। उसकी इच्छा को तरजी दे। "माँ" प्रकृति का दिया हुआ वो अनुपम आशीर्वाद और स्नेह रूपी उपहार है उसमें सभी दैवीय शक्तियां समाहित है, उसके आशीष मात्र से अन्न धन्न के भंडार भर जाते है, उसकी हंसी से ही अंगना में चांद खिल जाता है और सूरज की रोशनी चहुँ ओर फैल जाती है। उसके मार्गदर्शन व तराशने भर से शिक्षा, उन्नति के मार्ग खुल जाते है। शायद ये बात भी कटु सत्य है कि माँ सा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि एक वही है जो चाहे अमीरी हो गरीबी एक बालक की समस्त मनोकामनाएं वही पूरी करती है। ऐसी अतुल्य निधि का मान, सम्मान, इज्ज़त, पूजा उसके जीते जी ही करनी चाहिए। क्योंकि वो देखे और खुश हो वही काम और हमारी साधना, उपलब्धी तभी सफ़ल है। उसके जाने के बाद अगर संगमरमर की मूर्ति चौराहे पर भी बना दे तो व्यर्थ है और सभी ओर केवल और केवल घनघोर अंधेरा है।
स्वर्ग से उतरी अप्सरा हो तुम,
बहती निर्मल धारा हो तुम,
मैं मुर्ख, अज्ञानी भटक रहा था मुद्दतों से,
मेरी तपस्या को सुराह दिखाने वाली माँ हो तुम।

नगेंद्र बाला बारैठ - दिल्ली
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