: ठोको श्री जी की "होली" - अनिल गुप्ता ग्वालियरी
हमारे ठोको श्री जी
खूब उछाल रहे थे
उछल-उछल कर चौअन्नी
आप ने मारा हाथ
न खुद जीते न चन्नी
न काम आयी शेरो -शायरी
न काम आया चौका-छक्का
सटक गया देखो
आप का मुनक्का
खुद तो डूबे ही
चन्नी को भी ले डूबे
धरे रह गये ठोको श्री जी
आप के मन्सूबे
कुर्सी पाने को उछल रहे थे
एक पार्टी से दूजी बदल रहे थे
कुर्सी को महबूबा समझ
डा़ल रहे थे डो़रे
कुर्सी बेवफा निकली
रंगीन सपने
रह गये कोरे
ठोको श्री जी
दुल्हा बनने की चाहत में
चढ़ गये चुनावी घोडी़
'अनिल'
इतनी जो़र से खींची लगाम
घोडी़ जोर से उचकी
ठोको श्री जी
नीचे गिरे धडा़म
ठोको श्री जी ,बुरा न मानो
आप की तो मन गयी
सतरंगी होली
फ्लोप हो गया शो
गो-गो- श्री जी गो
ये कैसी रही झन-झन झनाट
आप को, आप के अन्दाज़ में
ठोको, सटाक
-अनिल गुप्ता ग्वालियरी
कवि-गीतकार-लेखक अभिनेता

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