: तुम भी आओ आज तो पिया, रंग जाओ मेरे रंग में - Dr. सुनीता संजीव दुबे
रंगो से भरी फिजाओं ने फिर हौले से मुस्कुराया है
लो फिर छाया फागुन का सुरूर, दिल ने फिर हौले से प्रीत को गुनगुनाया है
रंग उड़े, गुलाल उड़े, उड़ती है मस्ती हवाओं में
मन मिले, आनंद मिले और मिले दुलार जीवन की फिजाओं में
रंगो के इस इंद्रधनुष में और निखरे तेरा मेरा प्यार
कान्हा तो आए बरसाने, खेलन राधा संग होरी
तुम भी आओ आज तो पिया, रंग जाओ मेरे रंग में
उड़े तेरी प्रीत का गुलाल, मेरे भी मन मंदिर में
चंचल चितवन ने मस्त मगन हो प्रिय, दे ये स्नेह आमंत्रण तुम्हे बुलाया है
लो फिर छाया फागुन का सुरूर, दिल ने फिर हौले से प्रीत को गुनगुनाया है।
आज तो साजन हठ है, रंग ही दूंगी
तुमको मैं ऐसे जाने ना दूंगी
यू करना मुझसे जोराजोरी, मल ही दूंगी गुलाल मुख पर तेरे चोरी-चोरी
छूट न सका कान्हा के जीवन से, वो राधा का प्यार मलूंगी
रंग नहीं, बरसो-बरस न उतरे ऐसा खुमार मलूँगी
एक बार तो हाँ कर पिया, जीवन भर तेरा मान रखूंगी
कन्हैया के विश्वास, राधा की प्रीत का ही तो मेरे दिल पर शरमाया है
लो फिर छाया फागुन का सुरूर, दिल ने फिर हौले से प्रीत को गुनगुनाया है।।
Dr. सुनीता संजीव दुबे
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