: नए जमाने की लड़की - प्रो.वन्दना जोशी
ये नए जमाने की लड़की
सैंडल से ऊंचे अरमान रखती है आंखों में काली सीमा खींच
हर सीमा तोड़ना चाहती है।
रंगती है अपने होठों को
और दुनिया को रंगना चाहती है खोल देती है अपने बालों को आजाद यह पगली हो जाती हैं।
पैर नहीं टिकते ज़मी पर आसमान छूना चाहती हैं
कल्पना नहीं कर सकता कोई
ये अंतरिक्ष में परचम लहराती है।
रोकता जो कोई राह इसकी
इंदिरा बन सबक सिखाती है सुंदरता का लावण्य यह
सुष्मिता बन लुटाती है।
रखती है नजर पैसों पर
शौहरत भी कमाती है
बन निर्मला हमेशा यह
आर्थिक बोझ उठाती है ।
बेलन थामें चाहे बल्ला
मिताली बन छक्के छुड़ाती है जमा देती है चेहरे पर मुक्का
जब मेरीकॉम बन जाती है।।
नहीं बांध पाया इसे कोई
नहीं यह बंधना चाहती है अपराजिता है ये तो
सम्मान ये तुमसे चाहती है।।
✒️प्रो.वन्दना जोशी

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