: माँ मुझको भी तुम जादू की छड़ी ला दो न… - अनिता शर्मा
पानी सा निर्मल प्यार तेरा
गूँथ आटा उससे बेल बेल बढ़ाती हो
थपकियों दे दे कर आँचल सा फैलाती हो
नरम गरम सी समझाईश तेरी
सेक सेक कर घी सा स्नेह लगाती हो
धीमी-धीमी आँच पर हिम्मत को पकाती हो
अपने अहम को जलाकर स्वाभिमान बढ़ाती हो
बातों बातों में अपना हूनर मुझको भी सिखाती हो
दाल में माखन सा प्यार पिघलाकर रोज तुम खिलाती हो
कैसे कर लेती हो ये सब
इतना दिल बड़ा कहाँ से लाती हो
सबके नखरे सहकर भी हमेशा ही मुस्काती हो
अपने हिस्से की खुशियाँ माँ मुझपर ही लुटाती हो

सिकुड़ता जब मेरा मनोबल
तुम ममता सी चादर ओढ़ाती हो
पास रहूँ या दूर तुझसे
तुम सारा हाल समझ जाती हो
माँ तुम ये प्यार की गागर भर के कहाँ से लाती हो
भर भर कर इतना प्यार कैसे सब पे लुटाती हो
माँ मुझको भी तुम जादू की छड़ी ला दो न……
मैं भी तो ये जान सकूँ माँ कैसे तुम ये सब कर पाती हो…..
अनिता दीपक शर्मा - इंदौर
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