: सरल नहीं जीवन की राह, इस पथ पर कई अंधेरे है -प्रीति बर्वे बडोले
जग के रिश्ते नातों की इस आग में जलने आई हुं।
तप कर कुन्दन बनता है,
मैं कुन्दन बनने आई हुं।
गहरे सागर से मोती निकलकर छनकर,धुलकर निखरकर,सजकर
जा बैठता है ईश्वर की प्रतिमा में सर पर,
वही चमकता हुआ मोती बनने आई हुं।
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं,,,
सरल नहीं जीवन की राह
इस पथ पर कई अंधेरे है,
धुंध,कोहरा, काली रात लपेटे,
अनगिनत काल के पहरे है।
पर धुएं के आगे
रोशनी और रात के आगे सवेरा है
इस संघर्षमय जीवन में
संघर्ष की परिभाषा बनने आई हुं,
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं।
तानो बानो का अंकन करती,
सर्वदा मूल्याकंन में रहती ख्वाइशो को परे रखती,
निर्गुणो से संपन्नता की ओर बढ़ने आई हुं,
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं।
ममता,त्याग, मर्यादा, समर्पण,पर्याय ये नारी के,
धिमही,दित्या,विणा,शायला स्वरुप सारे नारी के
जननी होकर भी सृष्टि की कहलाती दुखियारी बेचारी है।
विष को पिकर भी, तन को भस्म कर भी,
अमरत्व पाने आई हुं।
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं।
जग के रिश्ते नातों की इस आग में जलने आई हुं
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं।
प्रीति बर्वे बडोले - इंदौर
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