: मैं हूं अबला कब बन जाऊं सबला - जयश्री अत्रे
मैं हूं अबला कब बन जाऊं सबला
ये कोई नही जानता, जब अपने पर आ जाऊं तो तूफानों से खेलूं
हर मुश्किल को पार कर जाऊं
कभी देवी बनूं ,कभी कभी मां बनूं
कभी बहन बनूं तो कभी पत्नी बनूं कभी दादी बनूं कभी नानी बनूं अपनी ममता की छांव में सबको रखूं कभी सबको जीवन की कठिनाइयों से उबारूं
हर रूप में अपने को ढालूं
कभी पापा की बेटी बनूं
कभी किसी की प्रेयसी बनूं
कभी नन्हे मुन्ने बच्चों की मां बनूं कभी शिव की अर्धांगिनी बनूं
कभी राम की सीता बनूं
कभी कान्हा की राधा बनूं
कभी उनकी मीरा बनकर उन्हे पूजूं
कभी शिव की जटा से निकलूं कभी विष्णु की लक्ष्मी बनूं
कभी दुष्टों का नाश करूं
कभी खुद में खुद को ढूंढू
कभी सब्र करती कभी खुद से ही लड़ती नारी बनकर नारायणी बनती
सबके दिलों में अपनी जगह बनाती
अपने प्रेम एवम स्नेह से सबको अपनी तरफ खींचती
कभी ठान ले तो वो कर जाए जो कोई नही कर पर
ऐसी हूं मैं नारी हूं कभी अबला भी हूं और कभी सबला
जयश्री अत्रे खंडवा
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