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: बेटी की पुकार - डॉ रेखा दशोरा

बेटी की पुकार - डॉ रेखा दशोरा

युग बीता पर उसमें अब तक ,
आई नहीं दरार है ,
बेटा और बेटी के बीच ,
भेदभाव की दीवार है।

सामाजिक सोंच और विषमताएं
दिन रात उसे पोषित करती हैं ,
असमानता का जहर जडों को ,
गति लिए पक्का करती हैं ।

क्षमताओं और भावनाओं के ,
साक्ष्य बेटी जब देने जाती है,
हर बार ही निष्फल रहती है ,
हर बार आघात ही खाती है ।

संपत्ति हो या शिक्षा ,
भेद सदा है बरता जाता,
स्त्री कोख से जन्म लेकर भी ,
पुरुष ही बन जाता है विधाता।

कितने ही कानून बना दो ,
विकास हेतु चाहे करो प्रचार ,
मानसिकता में बदलाव बिना ,
नारी को नहीं मिलेंगे अधिकार।

परिवर्तन तो लाना होगा ,
घर घर अलख जगाना होगा ,
विश्व गुरु बनने के लिए ,
आंगन को समतल बनाना होगा।

डॉ रेखा दशोरा

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