: इंदौर पत्रकारिता जगत के पितामह पद्मश्री नईदुनिया के अभय छजलानी का निधन
Thu, Mar 23, 2023
इंदौर : 1955 में पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया। 1963 में कार्यकारी संपादक का कार्यभार संभाला बाद में लंबे अरसे तक नईदुनिया के प्रधान संपादक भी रहे। वर्ष 1965 में उन्होंने पत्रकारिता के विश्व प्रमुख संस्थान थॉम्सन फाउंडेशन, कार्डिफ (यूके) से स्नातक की उपाधि ली। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र से इस प्रशिक्षण के लिए चुने जाने वाले वे पहले पत्रकार थे, पत्रकारिता जगत के पितामह कहलाने वाले पूर्व मे नईदुनिया Naiduniya के प्रधान संपादक पद्मश्री अभय जी छजलानी Abhay Chhajlaani विगत कई समय से लंबी बीमारी से ग्रसित थे आज सुबह उनका निधन हो गया है, 4 अगस्त 1934 को इंदौर मे हुआ था, पिता बाबू लाभचन्द छ्जलानी के सानिध्य मे साहित्य जगत को सीखने का अवसर प्राप्त हुआ, बचपन से ही लेखन के क्षेत्र मे आगे बढ्ने का संकल्प उन्हे शिखर तक पहुंचाने मे सार्थक साबित हुआ। आज शाम 5 बजे उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
एक छोटी सी तंग गली से प्रारम्भ हुआ अखबार पत्रकारिता की यूनिवर्सिटी कहलाने वाला अखबार नईदुनिया इंदौर ही नहीं अपितु देश मे भी अपनी ख्याति बना चुका था और ये सब अभय जी की लेखनी ने कर दिखाया था, उनका शुरू से ही लक्ष्य रहा था की हर अच्छे कारी को सहयोग करने मे उनका योगदान सर्वप्रथम रहता था, फिर चाहे वह नर्मदा नदी को इंदौर तक लाने मे भागीरथी की भूमिका हो या फिर खेल को आगे बढ़ाने मे हो या एक विश्वसनीय अखबार की पाठक शृंखला हो, हर कोई उनकी लेखनी का दीवाना था, अखबार के कर्मचारियों को उन्होने सदैव परिवार का दर्जा दिया, कर्मचारी की पीढ़ी दर पीढ़ी नईदुनिया मे कार्य करती रही उन्होने नईदुनिया को पाठको के दिलो मे स्थान दिलवाया, शासन प्रशासन हो या फिर विध्यार्थी हर कोई नईदुनिया का दीवाना बना।
नईदुनिया से ही मेरी पत्रकारिता को पंख लगे थे, अभय जी ने ही सिखाया था की किस प्रकार से आलेख और समाचार तैयार किए जाते है, आज बहुत स्तब्ध हूँ उनके निधन के समाचार को लिखते हुए, बहुत कम ऐसे संपादक अथवा पत्रकारिता के पितामह होते है जो दूसरों को आगे बढ़ाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते थे, पत्रकारिता जगत के इस नायाब हीरे को आज अपने बीच नहीं पाकर उनके ना होने का एहसास आँखों को नाम कर देता है, ईश्वर से यही विनय है की उन्हे आओने श्रीचरणों मे स्थान प्रदान करें, नईदुनिया के पितामह अभय जी छजलानी का निधन होने पर संगीत सेवा सहारा परिवार उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
दीपक पाठक - संपादक
: साथ देती है औरत - सपना सी.पी.साहू 'स्वप्निल'
Wed, Mar 8, 2023
देखों चिंता न करना, तुम्हारे साथ मैं हूं ना
जब तक मैं हूं, तुम हर चिंता से मुक्त रहना
मैं हूं औरत, प्यार की दौलत
सिर्फ लुटाती बदले में कुछ नहीं चाहती
देखों मैं मां हूं…
बच्चों के लिए सब दर्द सहती,
फिर भी ममता, स्नेह देती
मैं उनकी भूख-प्यास समझती
पढ़ाई लिखाई में प्रोत्साहित करती
उनकी गलतियों पर लताड़,
तो उनके लिए आंचल की छांव भी
मैं बच्चों को अच्छे-बुरे का फर्क समझाने वाली…
देखों चिंता न करना, मां बनकर साथ हूं ना
देखों मैं बहन हूं…
भाई से होने वाली प्यार भरी तकरार
उसका हित चाहने वाली सलाहकार
गैरों से भाई को बचाने के लिए ढाल
मैं भाई के लिए सदा ही मदद
उसके लिए स्नेह का रक्षाबंधन
उसकी विजय के लिए ललाट पर तिलक
मैं उससे मिले तोहफों के बदले, डाँट से बचाव…
देखों चिंता न करना, बहन बनकर साथ हूं ना।
देखों मैं पत्नी हूं…
पति के कंधे से कंधा मिलाकर चलती
उसकी तकलीफों में दोस्त बनती
पति से जुड़े हर रिश्ते का ख्याल रखती
उसकी पसंद, नापसंद से चलती
पति के लिए सजती-सँवरती
उसकी सुखद जिदंगी के लिए व्रत रखती
मैं पति के दिए मकान को सुंदर घर करती…
देखों चिंता न करना, पत्नी बनकर साथ हूं ना
देखों मैं बेटी हूं…
हर पल भोला सा दुलार देती
पिता के सम्मान की चिन्ता करती
नई-नई फरमाईश भले ही करती
पर अपने जीवन का नायक पिता को कहती
हर दम पापा का नाम रोशन करना चाहती
पिता की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश
मैं, मां से ज्यादा पिता की फिक्र करती…
देखों चिंता न करना, बेटी बनकर साथ हूं ना
देखों इसके अलावा भी कई रिश्तें
दादी, ताई, चाची, नानी, मौसी, मामी
तो कभी मित्र बनकर निभाती हूं
मैं औरत ही आदमी को पूर्ण करती हूं
मैं उसके लिए यश-कीर्ति-वैभव प्रार्थना
समृद्धि और दीर्घायु की कामना भी हूं
मैं सदा मांगती, पुरुष की खुशियों के लिए
मैं अपने सब रिश्ते सत्यनिष्ठा से निभाती हूं
देखों चिंता न करना, हितैषी बनकर साथ हूं ना
सपना सी.पी.साहू 'स्वप्निल'
इंदौर (म.प्र.)
: नए जमाने की लड़की - प्रो.वन्दना जोशी
Tue, Mar 7, 2023
ये नए जमाने की लड़की
सैंडल से ऊंचे अरमान रखती है आंखों में काली सीमा खींच
हर सीमा तोड़ना चाहती है।
रंगती है अपने होठों को
और दुनिया को रंगना चाहती है खोल देती है अपने बालों को आजाद यह पगली हो जाती हैं।
पैर नहीं टिकते ज़मी पर आसमान छूना चाहती हैं
कल्पना नहीं कर सकता कोई
ये अंतरिक्ष में परचम लहराती है।
रोकता जो कोई राह इसकी
इंदिरा बन सबक सिखाती है सुंदरता का लावण्य यह
सुष्मिता बन लुटाती है।
रखती है नजर पैसों पर
शौहरत भी कमाती है
बन निर्मला हमेशा यह
आर्थिक बोझ उठाती है ।
बेलन थामें चाहे बल्ला
मिताली बन छक्के छुड़ाती है जमा देती है चेहरे पर मुक्का
जब मेरीकॉम बन जाती है।।
नहीं बांध पाया इसे कोई
नहीं यह बंधना चाहती है अपराजिता है ये तो
सम्मान ये तुमसे चाहती है।।
✒️प्रो.वन्दना जोशी