: आरंभ चैरिटेबल फाउंडेशन की विविधरंगी काव्य गोष्ठी संपन्न
Sat, May 6, 2023
भोपाल : आरंभ चैरिटेबल फाउंडेशन साहित्यिक संस्था की गत दिवस "विविध रंगी आरंभ काव्य गोष्ठी" 9 मसाला रेस्टोरेंट, भोपाल हाट में गरिमामय माहौल में संपन्न हुई, जिसमें रचनाकारों ने अपनी विभिन्न विषयों पर प्रेरक रचनाओं से खूब वाहवाही बटोरी।
हृदय को संवेदना की कसौटी पर कसेंगी
कुछ रहे न रहे कविताएंँ रहेंगी।
भागते हुए वक़्त की चरितावली
संघर्ष की व्यथा - कथा
विकास की विरुदावली
कभी शांँति की संहिता रचेंगी
कुछ रहे न रहे कविताएंँ रहेंगी।
इसी तरह की रचनाओं, कविताओं की खुशबू से महकता रहा परिवेश।
कवयित्री निरूपमा खरे ने पढ़ा -
ये नाखुश औरतें,
चीखती- चिल्लाती, रार करती
खुद से भी बेजार औरतें।
साहित्यकार उषा सोनी ने पढ़ा -
घर- घर में उत्सव की छाई उमंग है,
द्वार - द्वार ऑंगन में बज रहे मृदंग हैं।
वरिष्ठ कवयित्री शेफालिका श्रीवास्तव ने अपनी रचना से श्रोताओं का मन मोह लिया -
मुट्ठी में वर्तमान है, मन में अतीत है,
अधरों पर कांँपता जीवन संगीत है।
इसी क्रम में शोभा ठाकुर ने भी अपनी प्रेरक रचना से दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी -
बेटा हो या बेटी हो तुम,
सुदृढ़ स्तंभ हो जीवन आधार के !
कर्म के रथ पर सजे,
उन्नति के शीर्ष तक पहुंचे हो तुम।
कार्यक्रम का संचालन कर रही बिन्दु त्रिपाठी ने पढ़ा -
मै सफलता के शिखर पर खड़ी मुस्कुराऊंँगी,
और तुम हाथ मलते रह जाओगे।
मै छू लूंँगी आसमा की बुलंदी, तुम देखते रह जाओगे ।
कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि मनी सक्सेना ने कहा -
समय बदलता है,
दे जाता है गौरव गाथा ,
कुछ सीख ,
यही है मानव की दरकार ।
विशिष्ट अतिथि डाॅ रेखा भटनागर ने कहा -
रंग और रेखाएँ रह जाएंँगी,
स्मृतियाँ शेष रह जाएंँगी ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही आरंभ फाउंडेशन की अध्यक्ष अनुपमा अनुश्री ने अपने प्रेरक उद्बोधन में साहित्य में आई विसंगतियों की ओर इंगित किया - मंचों पर पढ़ी जा रही अश्लील कविताओं पर कटाक्ष करते हुए लेखन के कमजोर स्तर पर चिंता जाहिर की और कहा कि साहित्य का स्तर उन्नत होना चाहिए।झूठी लोकप्रियता के फेर में साहित्य का स्तर गिरना नहीं चाहिए। उत्कृष्ट, प्रांजल भाषा, संवेदनाओं व काव्य तत्वों के बिना कविता अधूरी है। प्रकाशित तो हो सकती है, जोर- शोर से पढ़ी जा सकती है लेकिन ह्रदय को प्रकाशित नहीं कर सकती।
कार्यक्रम का सफल संचालन बिन्दु त्रिपाठी ने किया । इस अवसर पर साहित्यप्रेमियों ने कविताओं का रसास्वादन किया ।
: मेरे मन मंदिर रहे माँ - हरिदास बड़ोदे
Sat, May 6, 2023
मेरे मन मंदिर रहे माँ, मेरी प्यारी जान है।
तेरे चरणों में है जन्नत, तू मेरी पहचान है।
मेरे मन मंदिर रहे माँ..।।
पूज्य प्रथम माता-पिता, और गुरु मेरी शान है।
तेरे तन का मैं हूं कण, एक तू ही मेरा प्राण है।
तेरे बिन एक पल ना रहूं, तू ही मेरा सम्मान है।
मेरी जान कुर्बान तुझपर, तू मेरा अभिमान है।
मेरे मन मंदिर रहे माँ..।।
सबसे सुंदर है मेरी मैया, तेरे मीठे-मीठे बोल है।
सोना सा दिल तेरा माँ, सोने से भी अनमोल है।
लाड़ प्यार से तूने पाला, रोशन नाम मेरा किया।
मैने पाया नवजीवन, तूने जन्म मेरा धन्य किया।
मेरे मन मंदिर रहे माँ..।।
ममता मुझपर बनाए रखना, मैया तेरी संतान हूं।
तेरे दिल का मैं हूं टुकड़ा, मैं जो थोड़ा नादान हूं।
कई कष्ट दर्द लेकर मैया, हरपल मुझे संवारा है।
जब भी रहा परेशान मैंने, दिल से तुझे पुकारा है।
मेरे मन मंदिर रहे माँ..।।
तेरे खातिर पढ़े मरना तो, मैं भी मर मिट जाऊंगा।
मेरे बिन छलके आंसू तो, फौरन वापस आऊंगा।
तेरी राहों के कांटों को मैया, पलको से उठाऊंगा।
तेरे खून पसीने का भी, अब फर्ज मैं निभाऊंगा।
मेरे मन मंदिर रहे माँ..।।
तेरी शक्ति का हूं पूंज, मेरी विनती तू स्वीकार कर।
तेरे साया में रहूं सदा, तू मुझपर यह उपकार कर।
तेरी शक्ति मेरी भक्ति का, सारा जहां गुणगान करे।
तुझसे लूंगा हर जन्म, तू प्रार्थना मेरी स्वीकार करे।
मेरे मन मंदिर रहे माँ..।।
खुदा अगर तुझे कहे, तो हाजिर मैं हो जाऊंगा।
तेरे दूध का कर्ज कैसे, इस जन्म में चुकाऊंगा।
नाम दिया जो तूने हरि, मैं 'हरिप्रेम' नमन करूं।
तेरे चरणों में सदा रहूं, कोटि-कोटि प्रणाम करूं।
मेरे मन मंदिर रहे माँ..।।
हरिदास बड़ोदे 'हरिप्रेम', बैतूल (मध्यप्रदेश)
: मां का स्पर्श - सुशी सक्सेना
Fri, May 5, 2023
दवा काम आई, और न दुआ काम आई
जब भी जरूरत पड़ी तो, मां काम आई
मां का स्पर्श होता है एक दवा की तरह
जिसके मिलते ही मिट जाते हैं हर ज़ख्म
मां का स्पर्श होता है उस दुआ की तरह
जिसके लगते ही दूर हो जाते हैं हर ग़म
जो बरसता है अमृत की बूंदों की तरह
झरता है खुशबू बिखेरते फूलों की तरह
मां का स्पर्श साथ रहता है उम्र भर हवा की तरह
जिसके चलते ही पूरे हो जाते है दिल के अरमान
मां का स्पर्श होता है एक सदा की तरह
जिसके गूंजते ही, मन झूम उठता है हर शाम
मां का स्पर्श होता है उस काली घटा की तरह
जिसके छाते ही मिल जाती है दिल को ठंडक
मां का स्पर्श छू जाता है अक्सर मुझे तन्हाई में
और दिला जाता है उसके पास होने का अहसास
ऐ साहिब, मां का स्पर्श ऐसे ही जब तक मेरे साथ है
दुखों में भी होती रहती है खुशियों की बरसात है।
सुशी सक्सेना - इंदौर